सुप्रीम कोर्ट ने देश में पैकेट बंद खाने-पीने की चीज़ों पर सामने की तरफ चेतावनी लेबल लगाने में देरी करने पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (FSSAI) को कड़ी फटकार लगाई है. कोर्ट ने पूछा है कि क्या FSSAI बड़ी कंपनियों और कॉरपोरेट घरानों के दबाव में आकर देश के लोगों और बच्चों की सेहत से खिलवाड़ कर रहा है?
कोर्ट ने जिस मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की वह FOPL (फ्रंट ऑफ पैकेट वार्निंग लेबल) से जुड़ा है. आसान भाषा में कहें तो यह खाने की चीज़ों के पैकेट में ज़्यादा वसा (सैचुरेटेड फैट), चीनी या नमक की मात्रा के बारे में चेतावनी देने का मामला है. इस साल फरवरी में कोर्ट ने पैकेट के सामने साफ चेतावनी लिखने को लेकर कदम उठाने के लिए कहा था. कोर्ट का मानना था कि इस तरह का निशान देख कर लोग सामान खरीदते समय सही और सेहतमंद चीज़ चुन सकेंगे.
FSSAI ने क्या कहा?
गुरुवार, 13 अगस्त को हुई सुनवाई में FSSAI ने बताया कि उसने कंपनियों और दूसरे संबंधित पक्षों से इस बारे में चर्चा की थी. उनका मानना है कि लाल निशान या चेतावनी देखकर लोग डर जाएंगे. FSSAI ने सुझाव दिया कि इस तरह की चेतावनी की जगह एक छोटा चार्ट या टेबल देना बेहतर होगा. इस चार्ट में भारतीय लोगों के लिए तय मानक के हिसाब से दिन भर की सीमा बताई जाएगी.
जस्टिस जे बी पारडीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने इस सुझाव को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि FSSAI लोगों को यह बताने की बात कह रहा है कि उन्हें दिन भर में ज़्यादा से ज़्यादा 25 ग्राम चीनी, 10 ग्राम फैट और 5 ग्राम नमक लेना चाहिए. इस तरह ग्राहक दुकान पर खड़ा होकर हिसाब लगाता रहेगा कि उसे क्या और कितना खाना है. इससे चेतावनी देने का असली मकसद ही खत्म हो जाएगा.
बच्चे पैकेट बंद खाना ज़्यादा खा रहे हैं- जस्टिस
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के वकील ने तर्क दिया कि विदेश वाले नियम भारत में सीधे लागू नहीं किए जा सकते. उन्होंने कहा कि भारत के अपने पारंपरिक स्नैक्स और नमकीन हैं. इस आदेश के चलते उन पर भी लाल चेतावनी का निशान लग जाएगा. जजों ने इस तर्क को पूरी तरह से नकार दिया. जस्टिस पारडीवाला ने कहा कि जब बच्चे जंक फूड और पैकेट बंद खाना ज़्यादा खा रहे हैं, तो उन्हें जागरूक करना सबसे पहली ज़रूरत है.
FSSAI को उसके सुस्त रवैये के लिए फटकार लगाते हुए बेंच ने कहा कि शायद उस पर बड़ी-बड़ी कंपनियों का भारी दबाव है. जजों ने कहा कि कंपनियों के फायदे या नुकसान को लोगों की सेहत से बड़ा नहीं माना जा सकता. इस देश के लोगों, खासतौर पर छोटे बच्चों का सेहतमंद रहना ज़्यादा ज़रूरी है. सुनवाई के अंत में कोर्ट ने FSSAI को अपने फैसले पर दोबारा सोचने के लिए 2 सप्ताह का समय दिया. कोर्ट ने कहा कि अगर FSSAI खुद सही और सख्त फैसला नहीं ले पाता है, तो वह खुद अपनी तरफ से कड़ा आदेश जारी करेगा.
