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उपराष्ट्रपति से मिले JDU नेता, शरद यादव की राज्यसभा सदस्यता रद्द करने की मांग
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- September 05, 2017
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बिहार में महागठबंधन का साथ छोड़ने के बाद जेडीयू के शीर्ष नेतृत्व में चल रही रार लगातार बढ़ती जा री है. शरद यादव और नीतीश कुमार इस मुद्दे पर अलग-अलग राय रखते हैं.
विभिन्न सियासी मंचों के बाद अब जेडीयू की यह लड़ाई उपराष्ट्रपति के यहां तक पहुंच गई है. जेडीयू का एक प्रतिनिधि मंडल उपराष्ट्रपति से मिला और शरद यादव की राज्यसभा सदस्यता रद्द करने की मांग की.
उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू से जेडीयू के राज्यसभा में संसदीय दल के नेता आरसीपी सिंह और जेडीयू के महासचिव संजय झा मिलने पहुंचे. इन दोनों नेताओं ने उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को पार्टी सांसद शरद यादव की संसदीय सदस्यता ख़त्म करने के लिए पत्र सौंपा.
आपको बता दें कि नीतीश कुमार द्वारा बीजेपी के साथ गठबंधन कर बिहार में दोबारा सरकार बनाने के बाद शरद यादव लगातार महागठबंधन की वकालत करते रहे.
लालू की रैली में हुए थे शामिल
पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की ‘बीजेपी भगाओ, देश बचाओ’ महारैली में लालू प्रसाद यादव के साथ विपक्ष दलों के कई बड़े नेताओं ने मंच साझा किया था. गौर करने वाली बात थी कि सबसे पहले मंच पर नजर आने वाले बड़े नेताओं में जेडीयू के बागी नेता शरद यादव ही थे. जबकि जेडीयू की ओर से पहले ही साफ कह दिया गया था कि अगर शरद यादव ने लालू के साथ मंच साझा किया तो उन्हें पार्टी से निकाल दिया जाएगा.
‘साझी विरासत’ से साध रहे हैं निशाना
इसके अलावा शरद यादव इन दिनों अपने ‘साझी विरासत बचाओ’ कार्यक्रम के जरिए बीजेपी पर लगातार हमले कर रहे हैं. माना जा रहा है कि एक ओर जहां वे इस कार्यक्रम की मदद से विपक्ष को इकट्ठा कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर अपना सियासी दमखम दिखाने की भी कोशिश कर रहे हैं. यह कार्यक्रम पहले राजधानी दिल्ली और फिर कुछ दिनों पहले इंदौर में हो चुका है. शरद यादव ने इसके बाद गुजरात और राजस्थान में भी ऐसे आयोजन करने की बात की है.
सोमवार को भी किया था हमला
शरद यादव ने सोमवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि वे पिछले तीन साल से पार्टी को सही रास्ते पर लाने की कोशिश में लगे थे. उन्होंने कहा, “सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं करूंगा और अब मैं पार्टी से आजाद हो गया हूं.”
एनडीए पर हमलावर होते हुए शरद यादव ने कहा था, “मौजूदा एनडीए अटल और आडवाणी के एनडीए से अलग है और नये एनडीए का कोई राष्ट्रीय एजेंडा नहीं है. काले धन और आतंकवाद पर रोक लगाने के लिए नोटबंदी का फैसला लिया गया. लेकिन रिजर्व बैंक के आंकड़ों से सरकार की नाकामी उजागर हो गई है.”
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