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उत्तराखंड से रेकजाविक तक, जानें इस मुश्किल समय में भी भारत की दवाएं कैसे पहुंची आइसलैंड
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- May 13, 2020
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संपूर्ण लॉकडाउन (Lockdown) के बाद भी भारत अपनी दवा की खेप आइसलैंड तक पहुंचने में कामयाब रहा. 25,000 रोगियों के इलाज के लिए पर्याप्त मलेरिया की दवा क्लोरोक्वीन के 50,000 पैकेट भारत द्वारा भेजे गए. आइसलैंड की राजधानी रेकजाविक से हमारे प्रमुख राजनयिक संवाददाता सिद्धांत सिब्बल से बात करते हुए, आइसलैंड में भारत के राजदूत आर्मस्ट्रांग चांगसन ने कहा कि कैसे आइसलैंड की डिकोडे जेनेटिक्स और भारत की CSIR-IGIB महामारी पर हो रही रिसर्च में सहयोग करने के लिए तरीकों और साधनों की जांच कर रहे हैं.आर्मस्ट्रांग ने वहां फंसे हुए भारतीयों के बारे में भी बात की, जिनकी संख्या लगभग 10 है और भारतीय मिशन यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि वे किसी भी शेंगेन देश तक पहुंच जाएं जहां से वे भारत आ सकें.
COVID-19 महामारी पर भारत-आइसलैंड किस तरह से सहयोग कर रहे हैं?
टी. आर्मस्ट्रांग चांगसन: शुरुआत में, इस मिशन में विदेश मंत्रालय के सहयोग से 50,000 क्लोरोक्विन फॉस्फेट गोलियों की एक खेप को नकाला गया जो मार्च के अंत में लॉकडाउन के कारण अटक गई थी. इसमें पहले उत्तराखंड की फैक्ट्री से दवाओं को दिल्ली तक लाना, और फिर सीमा शुल्क आदि शमिल था. शिपमेंट आखिरकार 6 अप्रैल 2020 को आइसलैंड पहुंच गया. कुछ हफ्ते बाद, हमने आइसलैंड को लगभग 45 मिलियन पैरासिटामोल टैबलेट भी भेजे. हालांकि ये दोनों शिपमेंट व्यावसायिक थे लेकिन फिर भी इससे हमें बहुत सराहना मिली. उनके स्थायी सचिव श्री स्टर्ला सिगर्जोन्सन ने धन्यवाद संदेश भी लिखा.
इसके साथ ही, आइसलैंड की बायोटेक कंपनी डीकोडे जेनेटिक्स और हमारे CSIR और इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (IGIB) नई दिल्ली महामारी पर वैज्ञानिक रिसर्च पर सहयोग करने के लिए तरीकों और साधनों की जांच कर रहे हैं. पिछले महीने अप्रैल के मध्य में, आइसलैंड में COVID महामारी के प्रसार के बारे में, deCODE ने न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में एक पेपर प्रकाशित किया था. चूंकि कंपनी आनुवंशिक जोखिम वाले कारकों और बीमारियों पर अपने अध्ययन के लिए प्रसिद्ध है, इसलिए डीकोड ने पिछले 1000 साल के आइसलैंड के नागरिकों की पूरी वंशावली का एक व्यापक डेटाबेस तैयार किया, साथ ही आइसलैंड की आधी आबादी का आनुवंशिक विवरण और चिकित्सा रिकॉर्ड भी तैयार किया. मैंने ICSIR और ICMR के ध्यान में वो पेपर लाया जिसे उन्होंने बहुत प्रभावशाली पाया. इसके बाद CSIR-IGIB को भारतीय अनुसंधान संस्थान के रूप में पहचान दी गई ताकि डीकोड के साथ सहयोग किया जा सके.