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डॉलर के मुकाबले रुपया इतिहास के सबसे निचले स्तर पर, 70 के पार पहुंचा
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- August 14, 2018
- By admin
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भारत की अर्थव्यवस्था के लिए रुपया बुरी खबर लेकर आया है. डॉलर के मुकाबले रुपया इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है. रुपया का लुढ़कना जारी रहा और इस तरह एक डॉलर के मुकाबले रुपया 70.07 पर पहुंच गया. जो अब तक का सबसे निचला स्तर है. रुपये में आई गिरावट से शेयर बाजार हलकान है.
आज जैसे ही सुबह बाजार खुला, शुरुआती कारोबार में रुपये में मजबूती देखी और रुपया 23 पैसे चढ़कर 69.68 पैसे पर पहुंच गया, लेकिन ये तेज़ी बहुत जल्द ही गिरावट में तब्दील हो गई और रुपये 70 के मनोवैज्ञानिक आंकड़े को पार कर गया. शुक्रवार को रुपया 68.83 से 108 पैसे टूटकर सोमवार को 69.91 के निचले स्तर पर पहुंच गया था.
रुपये की वैश्विक बाजार में ये गिरावट दरअसल अमेरिका और तुर्की के बीच चल रही ट्रेड वॉर का असर माना जा रहा है. हाल ही में अमेरिका ने तुर्की से अपने बिगड़ते रिश्तों के बीच नई कर नीति का ऐलान किया है. अमेरिका की नई नीति के मुताबिक तुर्की के लिए स्टील और एल्युमिनियम के आयात पर लगने वाले करों को दोगुना कर दिया गया है. एल्यूमिनियम पर अब तुर्की को 20 फीसदी और स्टील पर 50 फीसदी कर देना होगा.
अमेरिका के इस फैसले से वैश्विक बाजार में अस्थिरता का माहौल है. जिसके कारण रुपये की कीमत तेज़ी से गिरी है.
टूटती रुपये की कीमत का असर क्या होगा?
रुपये की कीमत अगर कमज़ोर होती है तो देश का व्यापार घाटा और करेंट अकाउंट घाटा (सीएडी) बढ़ेगा. विदेशी मुद्राओं के जरिए विदेशों से किया जाने वाला लेन-देन यानी करेंसी इनफ्लो-आउटफ्लो का अंतर भी बढ़ेगा. भारत लगभग 70 फीसदी तेल का आयात विदेशों से करता हैं और ऐसे में रुपये के मुकाबले बेहद मंहगे डॉलर में भुगतान करना भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा.
इसका दूसरा असर विदेशों में रहने वाले भारतीय छात्रों को होगा. जो छात्र भारत से बाहर रह रहे हैं उन्हें करेंसी एक्सचेंज करनी पड़ती है और गिरती रुपये की कीमत उनके लिए भी परेशानी का सबब बन सकती है.
भारत के सामने सबसे बड़ी परेशानी
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की तेजी से बढ़ती कीमत ने देश के विदेशी मुद्रा बाजार को प्रभावित किया है. भारत के सामने इस वक्त बढ़ता व्यापार घाटा और ज्यादा कैपिटल आउटफ्लो सबसे बड़ी समस्या है. इसे समझने के लिए जानना होगा कि भारत कच्चे तेल को बड़ी मात्रा में आयात करता है, कच्चे तेल की बढ़ती कीमत के कारण भारत को मोटी रकम का भुगतान वैश्विक मुद्रा डॉलर में करना होगा.
सोमवार को कच्चे तेल की कीमत में 1 फीसदी की बढ़त हुई और इसी के साथ ये अपने साल 2014 के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया. इस वक्त वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत 75 डॉलर प्रति बैरल है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमत के पीछे वेनेजुएला का आर्थिक संकट, अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाया गया प्रतिबंध और तुर्की-अमेरिका के बीच चल रहा विवाद बड़ी वजहें मानी जा रही है.
भारत का करेंट अकाउंट घाटा (सीएडी) साल 2018 की तीसरी तिमाही तक 13.5 बिलियन पहुंच गया है. जो इसी अवधि में पिछले साल के घाटे से 87 फीसदी तक ज्यादा है. बाजार के जानकारों का मानना है कि इस वित्तीय वर्ष में ये घाटा छह सालों के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच जाएगा.
आरबीआई क्या कर रही है?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक देश का सेंट्रल बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरती रुपये की कीमत को संभालने के लिए कोशिशें शुरु कर दी हैं. आरबीआई की ओर से डॉलर में निवेश बढ़ाने के लिए एनआरआई लोगों को बॉन्ड जारी किए जा रहे हैं. कई राजकीय बैंकों ने भी डॉलर में निवेश बढ़ाने की कोशिश तेज कर दी है. माना जा रहा है कि आरबीआई ने एक्सचेंज ट्रेडेड फ्यूचर मार्केट के जरिए 800 मिलियन डॉलर जुटा लिए हैं.
जानकारों का कहना है कि भारत मैक्रो इकॉनमिक्स के बेसिक में बेहतर है. ये गिरावट अस्थाई है और तुर्की-अमेरिका का ताज़ा प्रकरण इसका बड़ा कारण है. भारत की ये आर्थिक स्थिति काबू में की जा सकती है
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