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सुप्रीम कोर्ट को शादी रद्द करने का अधिकार है या नहीं? 5 जजों की संविधान पीठ आज सुनाएगी फैसला
सुप्रीम कोर्ट सोमवार (1 मई) को अनुच्छेद 142 के तहत मिलने वाली विशाल शक्तियों के प्रयोग को लेकर अहम फैसला सुना सकता है. शीर्ष अदालत की संविधान पीठ ये फैसला करेगी कि सुप्रीम कोर्ट को किसी शादी को सीधे रद्द करार देने का अधिकार है या उसे निचली अदालत के फैसले के बाद ही अपील सुननी चाहिए .
पिछले दो दशक से अधिक समय से सुप्रीम कोर्ट ने असाधारण रूप से टूटी हुई शादियों को रद्द करने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशाल शक्तियों का प्रयोग किया है. हालांकि, सितंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट इस बात पर विचार करने के लिए सहमत हो गया था कि क्या वह दोनों पार्टनर की सहमति के बिना अलग रह रहे जोड़ों के बीच विवाह को रद्द कर सकता है.
संविधान पीठ ने फैसला रखा है सुरक्षित
जस्टिस एसके कौल, संजीव खन्ना, ए एस ओका, विक्रम नाथ और जे के माहेश्वरी की पांच जजों की संविधान पीठ ने 29 सितंबर, 2022 को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. फैसला सुरक्षित रखते समय कोर्ट ने कहा था कि सामाजिक परिवर्तन में “थोड़ा समय” लगता है और कभी-कभी कानून लाना आसान होता है लेकिन इसके साथ समाज को बदलने के लिए राजी करना मुश्किल होता है.
शीर्ष अदालत ने इस बात का भी संज्ञान लिया था कि भारत में शादियों में परिवार की बड़ी भूमिका होती है. अदालत इस बात पर विचार कर रही है कि अगर अदालत को लगता है कि शादी पूरी तरह से टूट गई है लेकिन एक पक्ष तलाक का विरोध कर रहा है. ऐसी स्थिति में क्या अनुच्छेद 142 के तहत शादी रद्द करने में उसकी व्यापक शक्तियां किसी भी तरह से बाधित होती हैं.
क्या है अनुच्छेद 142?
संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को विशाल अधिकार देता है, जिसके तहत उसके समक्ष लंबित किसी भी मामले में “पूर्ण न्याय” करने के लिए शीर्ष अदालत फैसला सुना सकती है.
इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ को दो सवाल संविधान पीठ को भेजे गए थे. अनुच्छेद 142 के तहत SC द्वारा इस तरह के अधिकार क्षेत्र का प्रयोग बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए या क्या इस तरह के अभ्यास को हर मामले के तथ्यों में निर्धारित करने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए.
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